कोटद्वार। कॉर्बेट टाइगर रिजर्व (सीटीआर) में बाघों की बढ़ती तादाद गढ़वाल वन प्रभाग के लिए सिरदर्द बन रही है। सीटीआर की सीमा से बाहर निकल बाघ गढ़वाल वन प्रभाग की दीवा रेंज के जंगलों में पहुंच रहे है। यहां यह बताना बेहद जरूरी है कि गढ़वाल वन प्रभाग में न तो बाघ संरक्षण के लिए किसी तरह के बजट की कोई व्यवस्था है और न ही ऐसे संसाधन मौजूद हैं, जिनसे बाघ पर नजर रखी जा सके।




बीते दिनों दीवा रेंज के अंतर्गत हल्दूखाल क्षेत्र में सक्रिय वयस्क नर बाघ को पकड़ने में गढ़वाल वन विभाग के कर्मियों को जिस तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा, वह किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं। हालात यह रहे कि बाघ को पकड़ने के लिए पिंजरे तक प्रभाग को अन्य क्षेत्रों से मंगवाने पड़े।
बाघों को लगातार किया जा रहा है रेस्क्यू
बीती 27 अक्टूबर को नैनीडांडा प्रखंड के अंतर्गत ग्राम सिमड़ी के समीप मुजरा बैंड पर गढ़वाल वन प्रभाग की दीवा रेंज के कर्मियों ने क्षेत्र में सक्रिय एक वयस्क नर बाघ को ट्रैंक्यूलाइज कर कॉर्बेट टाइगर रिजर्व की ढेला रेंज में स्थित रेस्क्यू सेंटर में भेज दिया। पिछले छह माह में इस रेंज की टीम तीन बाघों को सुरक्षित रेस्क्यू सेंटर पहुंचा चुकी है। लेकिन, यह अभियान कर्मियों की इच्छाशक्ति के दम पर ही धरातल पर उतर पाया।
अन्यथा संसाधनों की बात करें तो टीम ने जहां राइफल अन्य स्थानों से मंगवाई, वहीं ड्रोन कैमरा की व्यवस्था भी सीटीआर से करवानी पड़ी। ट्रैंक्यूलाइज गन के लिए दवा तक पर्याप्त न थी। यह तय है कि दीवा रेंज के जंगलों में आज भी बाघों की मौजूदगी है। यह बात अलग है कि इन बाघों की आज तक गणना नहीं हो पाई है।
यह है संसाधनों की स्थिति
गढ़वाल वन प्रभाग की दीवा रेंज में न तो पर्याप्त मात्रा में कर्मी हैं और न ही बंदूक उपलब्ध है। जब क्षेत्र में बाघ की सक्रियता पर गश्त शुरू हुई तो अन्य रेंजों से दो बंदूकों का प्रबंध किया गया। बाघ पर नजर रखने के लिए ड्रोन भी सीटीआर से मंगवाना पड़ा।
हल्दूखाल क्षेत्र में सक्रिय बाघ को दस वन कर्मियों की टीम 24 दिनों तक दिन-रात करीब बीस किमी. के क्षेत्र में तलाशती रही। इस अभियान के दौरान जहां पहाड़ की विषम भौगोलिक परिस्थितियां आड़े आई, वहीं डंडों के दम पर बड़ी-बड़ी झाड़ियों में बाघ को तलाशना खुद की जान जोखिम में डालने समान था। रात्रि में गश्त के लिए विभाग के पास हाई पावर सर्च लाइट भी नहीं थी।
अधिकारी ने कही ये बात
बाघ को सुरक्षित पकड़ना वास्तव में बड़ी चुनौती था। विषय परिस्थितियों में जिस तरह बाघ को सुरक्षित पकड़ रेस्क्यू सेंटर पहुंचाया गया, वह पूरी टीम की इच्छाशक्ति से संभव हो पाया। सीटीआर से सटा होने के कारण इस क्षेत्र में भविष्य में भी बाघ के आने की संभावना है। ऐसे में उच्चाधिकारियों से वार्ता कर संबंधित रेंज में संसाधन उपलब्ध करवाए जाएंगे।
