




चंदेरी
मध्यकालीन भारतीय इतिहास के अध्ययन में अब तक राजनैतिक सत्ता, युद्धों और वंशावलियों को प्रधानता दी जाती रही है, जबकि नगर-निर्माण, जल-संरचना तथा लोक-कल्याण में योगदान देने वाले स्थानीय संरक्षकों और दानदाताओं—विशेषतः स्त्रियों—की भूमिका अपेक्षाकृत उपेक्षित रही है। चंदेरी (जिला अशोकनगर, मध्य प्रदेश) स्थित सिंहपुर चाल्दा क्षेत्र की राजमती बावड़ी से प्राप्त संवत् 1535 (28 जनवरी 1479 ई.) का शिलालेख इस दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह एक ऐसी स्त्री के जीवन और कार्यों को उजागर करता है, जिसकी कीर्ति सत्ता से नहीं, बल्कि दान, करुणा और सामाजिक उत्तरदायित्व से उपजी थी।
*शिलालेख का भौतिक एवं भाषिक स्वरूप -*
राजमती बावड़ी से प्राप्त यह शिलालेख नागरी लिपि में उत्कीर्ण है और इसमें कुल 36 पंक्तियाँ हैं। इनमें से 16 पंक्तियाँ संस्कृत पद्य में तथा 20 पंक्तियाँ प्रारंभिक हिंदी गद्य में अंकित हैं। यह मिश्रित भाषिक स्वरूप अपने आप में मध्यकालीन सामाजिक-सांस्कृतिक संक्रमण को दर्शाता है। अभिलेख की भाषा, अलंकरण और कथ्य से यह स्पष्ट होता है कि इसे केवल स्मारक-लेखन नहीं, बल्कि स्मृति-संरक्षण के उद्देश्य से रचा गया था।
*वंश-परंपरा एवं पारिवारिक पृष्ठभूमि -*
शिलालेख के अनुसार राजमती का मूल संबंध शिरोहनगर से था। अभिलेख में उनके वंश का क्रमिक विवरण मिलता है—छज्जला, उवारा और भैरव। भैरव का वर्णन विद्या, भक्ति और त्यागशीलता से युक्त व्यक्ति के रूप में किया गया है, जिन्होंने पैतृक संपदा का त्याग कर गृहत्याग का मार्ग अपनाया। गुजरात क्षेत्र में उनके प्रवास का उल्लेख मिलता है, जहाँ उन्होंने ब्राह्मणों के साथ पवित्र स्थल पर निवास किया।
इसी भैरव की पुत्री के रूप में राजमती का जन्म हुआ। शिलालेख में उनके रूप, वाणी, विद्या और नृत्य-कला का वर्णन मिलता है, किंतु यह वर्णन केवल सौंदर्य-गान तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके व्यक्तित्व की सामाजिक प्रतिष्ठा को रेखांकित करता है। तेजस्विता और युक्तिपूर्ण व्यवहार के कारण उन्हें ‘राजमती’ की उपाधि प्राप्त हुई।
*राजमती और समकालीन सत्ता-संरचनाएँ -*
शिलालेख से ज्ञात होता है कि राजमती का संपर्क मांडू के सुल्तान घियास-उद-दीन (Ghiyath al-Din Khalji) से था। सुल्तान द्वारा उन्हें प्रदत्त धन, हाथियों और अन्य संसाधनों का उल्लेख अभिलेख में विस्तार से मिलता है। यह महत्वपूर्ण तथ्य है कि राजमती ने इस धन का उपयोग निजी वैभव के स्थान पर सार्वजनिक हित के कार्यों में किया।
अभिलेख में यह भी वर्णित है कि राजमती का यश मांडू तक सीमित नहीं रहा। जौनपुर के सुल्तान हुसैन शाह, पांडुआ के बरबक शाह, दिल्ली के बहलोल लोदी, थट्टा के तुगलक शासक, गुजरात के कुतुब-उद-दीन तथा बीदर के बहमनी शासक द्वारा उन्हें विभिन्न प्रकार की भेंटें प्रदान किए जाने का उल्लेख मिलता है। यह विवरण मध्यकालीन भारत में एक स्त्री की अंतर-क्षेत्रीय प्रतिष्ठा और सामाजिक स्वीकार्यता का दुर्लभ प्रमाण प्रस्तुत करता है।
*राजमती बावड़ी : लोक-कल्याण का स्थापत्य -*
राजमती के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण और स्थायी योगदान राजमती बावड़ी का निर्माण है। शिलालेख में इस बावड़ी के जल को शुद्ध, शीतल और अमृततुल्य बताया गया है।
स्थापत्य-निर्माण के अवसर पर वैदिक अनुष्ठानों, ब्राह्मणों के आमंत्रण तथा स्वर्ण-तुल्य दान के विवरण से यह स्पष्ट होता है कि यह कार्य धार्मिक और सामाजिक—दोनों दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया।
बावड़ी का निर्माण यात्रियों और स्थानीय जनसमुदाय के लिए किया गया था, जिससे यह संरचना केवल धार्मिक दान न होकर सार्वजनिक जल-संरचना के रूप में स्थापित होती है। यह तथ्य चंदेरी के मध्यकालीन शहरी विकास को समझने में सहायक है।
*परिवार एवं उत्तराधिकार -*
शिलालेख में राजमती के परिवार का भी उल्लेख है पिता भैरौदा, माता माणिकदेवी, बहन भानुमती, भाई दासु तथा पुत्र रामचन्द्र और वेणीदास। रामचन्द्र को महाकवि, दानशील और चरित्रवान बताया गया है तथा गियासशाही और नासिरशाही शासकों द्वारा सम्मानित होने का उल्लेख मिलता है। इससे स्पष्ट होता है कि राजमती का परिवार विद्या और सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय था।
*तिथि-निर्धारण और लेखक -*
अभिलेख के अनुसार माघ शुक्ल पंचमी, बुधवार, संवत् 1535 (28 जनवरी 1479 ई.) को राजमती भाटिनी द्वारा इस बावड़ी की स्थापना की गई। इस पूरे विवरण को मुनि गुणसुंदर द्वारा लिपिबद्ध किया गया, जिनका उद्देश्य इस दानशील स्त्री के यश को कालजयी बनाना था।
*संरक्षण की आवश्यकता -*
राजमती बावड़ी का शिलालेख चंदेरी के इतिहास में स्त्री-केंद्रित दान और लोक-कल्याण की परंपरा का एक प्रामाणिक साक्ष्य है। यह अभिलेख सिद्ध करता है कि नगर का ऐतिहासिक विकास केवल शासकों और युद्धों से नहीं, बल्कि स्थानीय संरक्षकों के सतत योगदान से भी निर्मित हुआ।
वर्तमान में यह बावड़ी राज्य पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित है, किंतु इसके संरक्षण और प्रस्तुतीकरण की तत्काल आवश्यकता है। यदि इसका वैज्ञानिक जीर्णोद्धार कर सूचना-पट्ट, शिलालेख की प्रतिलिपि और व्याख्यात्मक विवरण उपलब्ध कराए जाएँ, तो यह स्थल न केवल शोधार्थियों बल्कि पर्यटकों के लिए भी चंदेरी के इतिहास का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है।
यह शिलालेख स्मरण कराता है कि इतिहास में यश केवल सत्ता से नहीं, बल्कि दान, करुणा और विवेक से भी अर्जित किया जाता है।




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