



चित्रकूट धाम में ढाबा या दरबार-ए-शराब? चित्रकूट की पवित्र धरती पर बेड़ी पुलिया बनी मदिरा मेला, प्रशासन ने ओढ़ रखी श्रद्धा-सी चुप्पी!”



चित्रकूट — जहां भगवान स्वयं तपस्या में लीन रहे, वही तपोभूमि अब मयखाना बन चुकी है।
बेड़ी पुलिया के ढाबों में हर शाम जब दीपक की लौ जलती है, वहीं शराब के प्यालों में ‘नया उजाला’ भरने का खेल शुरू हो जाता है।
नाम है शंकर ढाबा, पर दर्शन मिलते हैं ‘मदिरा-मंथन’ के।
श्रद्धालु जब मंदिरों की ओर बढ़ते हैं तो रास्ते में भक्ति नहीं, बल्कि बॉटल की खनक सुनाई देती है।
कहते हैं, यहां अब प्रसाद नहीं, “पैग” परोसे जा रहे हैं — और मांसाहारी-शाकाहारी ढाबों में आस्था और अवैधता एक ही थाली में परोसी जा रही है।
सबसे मज़ेदार बात यह कि यह सब कुछ हो रहा है यूपी प्रशासन की निगरानी में, या कहिए उन्हीं की ‘अनदेखी में’।
लगता है प्रशासन ने नया व्रत लिया है — “देखो मत, सुनो मत, बस तनख्वाह भरो और चैन की नींद सो जाओ।”
श्रद्धालु भौचक्के हैं — कहते हैं, “जब भगवान के नाम पर खुले ढाबों में शराब और अंडा बिक रहा है, तो फिर धर्मनगरी का क्या अर्थ बचा?”
सवाल तो बड़ा है — क्या चित्रकूट की पवित्रता अब ‘परमिट’ पर चलेगी? क्या अब भगवान के दरबार तक पहुंचने से पहले हर भक्त को मय-महक का सामना करना होगा?
क्या यही “धार्मिक पर्यटन” की नई परिभाषा है?
क्या यही “कानून व्यवस्था” है जिसमें आस्था को ‘बोतल’ में बंद कर दिया गया है?
क्या जिम्मेदार अफसर सिर्फ व्हाट्सऐप आश्वासन देने तक सीमित रहेंगे या कभी सड़कों पर उतरकर इस पाखंड का अंत करेंगे?
चित्रकूट में अब यह तय करना मुश्किल है — यहां भगवान के नाम की गूंज ज़्यादा है या बियर-बोतल की टकराहट।
बेड़ी पुलिया अब प्रशासन की सबसे बड़ी परीक्षा बन चुकी है —
अगर यह मयखाना बंद नहीं हुआ, तो यह “चित्रकूट धाम” नहीं, “चित्रकूट बदनाम” बन जाएगा।

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