

बांदा-दीपावली के दौरान धनतेरस से दीवाली मनाने के बाद तक बुंदेलखंड क्षेत्र में दीवारी नृत्य का आयोजन किया जाता है।जिसमें युवाओं की टोली लाठी डंडों से करतब दिखाते हुए नृत्य का प्रदर्शन करती है।यह दिवारी सिर्फ नृत्य नहीं बल्कि शौर्य साहस सहनशीलता और आत्मविश्वास का प्रतीक है।दिवारी बुंदेलखंड की संस्कृति और परम्परा का हिस्सा होने के साथ साथ खेल मनोरंजन व शरीर को स्वस्थ रखने में योग जैसा ही योगदान देती है।इस नृत्य के दौरान एक युवा लकड़ी का लठ्ठ लेकर अपने विरोधियों को हराने की कोशिश करता हुआ दिखाई देता है।किंतु अभी तक इस नृत्य को प्रोत्साहित कर इसे बुंदेलखंड के बाहर पहचान दिलाने महिलाओं को मजबूत करने के उद्देश्य से इससे जोड़ने का प्रयास नहीं किया गया और ना ही इस नृत्य को बुंदेलखंड में ही और भव्य बनाने के लिए कोई ठोस कदम उठाए जा रहे।सुमित शुक्ला ने बताया कि दिवारी बुंदेलखंड की परम्परा का अभिन्न हिस्सा होने के साथ क्षेत्रीय मार्शल आर्ट भी है।जिसे सीखने के बाद महिलाएं अपने आपको सुरक्षित महसूस कर सकती हैं।विशेष परिस्थिति में आत्मरक्षा में इसका इस्तेमाल कर सकती हैं।सरकार इस नृत्य को प्रोत्साहित करें तो यह एक ऐसा नृत्य है,जो बुंदेलखंड के साथ साथ वैश्विक स्तर पर भी भारतवर्ष की पहचान बनेगा।




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