




रामकृष्ण मठ, लखनऊ में स्वामी अखण्डानन्दजी की जयंती मनाई गई।
रविवार को रामकृष्ण मठ, निराला नगर, लखनऊ में स्वामी अखण्डानन्दजी की जयंती भव्य रूप से मनाया गयी। सुबह 4ः30 बजे शंखनाद व मंगल आरती के उपरांत 6ः50 बजे वैदिक मंत्रोच्चारण, ’नारायण सूक्तम’ का पाठ और ’जय जय रामकृष्ण भुवन मंगल’ का समूह में गायन रामकृष्ण मठ के अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानन्दजी महाराज के नेतृत्व में हुआ तत्पश्चात 7ः15 बजे से स्वामी मुक्तिनाथानन्दजी महाराज द्वारा (ऑनलाइन) सत् प्रसंग हुआ।
शाम 7ः05 बजे मुख्य मंदिर में संध्यारति के उपरांत स्वामी सारदानन्दजी द्वारा रचित ’सपार्षद-श्री रामकृष्ण स्तोत्रम’ का पाठ रामकृष्ण मठ, लखनऊ के स्वामी इष्टकृपानन्द के नेतृत्व में हुआ।
सायं 7ः15 बजे से रामकृष्ण मठ, लखनऊ के अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानन्द जी ने स्वामी अखण्डानन्दजी के जीवनी एवं संदेश पर प्रवचन देते हुये बताया कि स्वामी अखण्डानन्दजी महाराज 30 सितम्बर 1864 ईसवी में कलकत्ता में जन्म ग्रहण किये थे उनका पूर्वाश्रम का नाम था गंगाधर गंगोपाध्याय। जब उनका उम्र 19 साल हुआ था तब वे दक्षिणेश्वर में श्री रामकृष्ण के चरणों में मिले थे एवं उनसे आध्यात्मिक शिक्षा प्राप्त करते हुये सन् 1887 में संन्यास ग्रहण किये एवं संन्यास उपरान्त उनका नाम स्वामी अखण्डानन्द हुआ। वे भारत के विभिन्न प्रान्तों में तथा तिब्बत एवं हिमालय में भ्रमण करके 15 मई 1897 में रामकृष्ण मिशन के प्रथम राहतकार्य का शुरूआत किये। पश्चिम बंगाल के दुर्भिक्ष पीड़ित मुर्शिदाबाद जनपद में चावल वितरण करके इस महान कार्य का शुभारम्भ हुआ था। उसके पश्चात उन्होंने सारगाछी में अनाथ आश्रम स्थापित किया एवं गरीबों की सेवा करते हुये अपने जीवन में यह प्रमाणित किया ‘‘मानव सेवा ही माधव सेवा’’ है।
स्वामी अखंडानंद रामकृष्ण संघ के पहले संन्यासी थे, जिन्होंने मिशन की स्थापना से पहले ही ग्रामीण विकास कार्य शुरू करने की स्वामी विवेकानन्द की पोषित इच्छा को मूर्त रूप दिया। उन्होंने स्वामी विवेकानन्द के इस आदेश का अक्षरशः पालन किया, “गरीब, अनपढ़, अज्ञानी, पीड़ित – इन्हें अपना भगवान मानो। जान लो कि इनकी ही सेवा करना सबसे बड़ा धर्म है।“
1922 ईसवी में आप रामकृष्ण संघ के सहाध्यक्ष निर्वाचित हुये एवं सन् 1934 में रामकृष्ण संघ के तृतीय अध्यक्ष बने। उनकी किताबें, भाषण तथा आध्यात्मिक शिक्षा से अगनित नर-नारी अनुप्राणित हुये एवं उन्होंने ‘‘शिव ज्ञान से जीव सेवा’’ कैसे किया जाता है उसका आर्दश स्थापन करके चिरस्मरणीय हुये है।
प्रवचन के उपरान्त देवीनाम संकीर्तन स्वामी मुक्तिनाथानन्दजी के नेतृत्व में हुआ तथा कार्यक्रम में उपस्थित सभी भक्तों को प्रसाद वितरण के साथ कार्यक्रम समाप्त हुआ।

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