फुटबॉल से क्रिकेट पहुंचा यो-यो
यो-यो टेस्ट होता कैसे है, ये जानने से पहले ये है क्या, ये समझते हैं। क्रिकेट से पहले इसकी शुरुआत फुटबॉल फील्ड पर हुई। डेनमार्क के फुटबॉल फिजियोलॉजिस्ट जेन्स बैंग्सबो ने इस डेवलप किया। क्रिकेटिंग वर्ल्ड में सबसे पहले ऑस्ट्रेलिया ने इसे फॉलो किया। इसका एकमात्र मकसद खिलाड़ियों की फिटनेस लेवल को खेल बराबर लाना है। यो-यो टेस्ट सिलेक्शन के लिए बुरा है या अच्छा है… इस पर जाने से पहले ये जान लीजिए कि टेस्ट बड़ा टफ होता है। ये टेस्ट पूरी तरह से टेक्नोलॉजी बेस्ड है। सॉफ्टवेयर से नतीजे रिकॉर्ड किए जाते हैं। जिससे प्लेयर्स की फिटनेस और स्टामिना के बारे में पता चलता है। टेस्ट में 23 लेवल होते हैं, लेकिन प्लेयर्स 5वें लेवल से शुरुआत करते हैं।




बेहद टफ है यो-यो टेस्ट
टैलेंट या सिलेक्शन
इसे टटोलने से पहले एक चीज क्लियर कर लेते हैं कि क्रिकेट में फिटनेस दो टाइप की होती है। पहली ये कि कोई प्लेयर कैसे खुद को तैयार कर रहा है। ग्राउंड के कितने चक्कर लगा रहा है। कितनी अलग-अलग एक्सरसाइज कर रहा है। और दूसरी क्रिकेट फिटनेस, जो नेट्स पर घंटों बैटिंग या बोलिंग करना होता है। आज तो हर प्लेयर के पास सिक्स पैक एब्स हैं, लेकिन 70s-80s इनफैक्ट 90s में चीजें अलग थीं। तब नॉर्थ के दौड़ने-भागने में तेज थे तो मुंबई-चेन्नई-बैंगलोर वाले नेट्स पर वक्त गुजारते थे।

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