12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु से सवाल किया कि जब कर्नाटक खुद पानी की कमी और सूखे की स्थिति से जूझ रहा है, तो वह कावेरी जल के बकाया हिस्से की भरपाई कैसे करेगा। यह टिप्पणी कोर्ट की एक डिवीजन बेंच ने तब की जब तमिलनाडु ने आवेदन दाखिल किया था कि 6 अक्टूबर तक उन्हें बिलिगुंडलु पर कावेरी जल के अपने हिस्से में लगभग 11.7 हजार मिलियन क्यूबिक फीट की कमी हुई है।




वर्तमान स्थिति के कारण क्या हैं?
इस साल की दक्षिण-पश्चिम मानसून (जून-सितंबर) में हुई विफलता वर्तमान विवाद का मुख्य कारण है। 1 जून से 7 अक्टूबर तक कावेरी जल संग्रहण क्षेत्र में सामान्य वर्षा की तुलना में 30% कम बारिश हुई है। खासतौर पर कृष्णराज सागर (केआरएस) और कबिनी के नीचे बिलिगुंडलु तक के क्षेत्र में 43% वर्षा की कमी दर्ज की गई। 57.568 हजार मिलियन क्यूबिक फीट की अपेक्षित आपूर्ति के मुकाबले केवल 45.849 हजार मिलियन क्यूबिक फीट जल की उपलब्धि हुई। यह आंकड़ा कावेरी जल विनियमन समिति (सीडब्ल्यूआरसी) ने निकाला, जो कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (सीडब्ल्यूएमए) की मुख्य सहायता संस्था है। तमिलनाडु ने भी अपने आवेदन में इसी आंकड़े को उद्धृत किया और 8 अक्टूबर की सीडब्ल्यूएमए बैठक में कर्नाटक से 15.02 हजार मिलियन क्यूबिक फीट बकाया पानी भरने की मांग की।
कर्नाटक ने इस मांग पर क्या प्रतिक्रिया दी?
कर्नाटक ने सुप्रीम कोर्ट में बताया कि वह बकाया पानी देने में कठिनाई महसूस कर रहा है। पिछली सप्ताह सीडब्ल्यूएमए की बैठक में राज्य ने सूखा परिस्थिति का हवाला देते हुए कहा कि कावेरी बेसिन के चार जलाशयों में 54% कम पानी का संचयन हुआ है। यहां उन्हें पीने के पानी व पर्यावरणीय जल प्रवाह (45 हजार मिलियन क्यूबिक फीट) को प्राथमिकता देनी पड़ रही है। कर्नाटक ने अदालत को बताया कि वह 9 अक्टूबर से 15 दिनों तक 3,000 क्यूसेक जल प्रवाह देने के आदेश का पालन कर रहा है और कहा कि तमिलनाडु को आगामी उत्तर-पूर्व मानसून से जल संग्रह का लाभ होगा।
तमिलनाडु का रुख क्या है?
निचले तटीय राज्य तमिलनाडु ने प्राधिकरण और अदालत दोनों के सामने यह जताया है कि 3,000 क्यूसेक जल प्रवाह बिल्कुल अपर्याप्त है और पहले से जमा बकाया पानी की कमी को पूरा नहीं करता। उनका कहना है कि बुलिगुंडलु पर अक्टूबर माह में 3,500 क्यूसेक जल देना चाहिए था, न कि 3,000 क्यूसेक। जल प्रवाह में कमी से यहां की सांबा फसलों और किसानों के जीवन पर गंभीर असर हो सकता है। इसके अलावा, उत्तर-पूर्व मानसून की भविष्यवाणी अधिक अनिश्चित है और यह भौगोलिक तौर पर और समय में काफी भिन्न होती है, जैसा कि 2002 में विज्ञान विभाग के शोधकर्ताओं ने बताया।
कोर्ट ने दोनों राज्यों के तर्कों पर क्या कहा?
डिवीजन बेंच के मुख्य न्यायाधीश विक्रमनाथ ने कहा कि “बकाया केवल तब बढ़ाया जा सकता है जब अतिरिक्त पानी उपलब्ध हो। बारिश कम हो तो बकाया कैसे पूरा होगा? कर्नाटक खुद पानी की कमी से जूझ रहा है। यदि उनके पास अतिरिक्त पानी है और वे आपका हिस्सा नहीं दे रहे हैं तो ही बकाया भरने की संभावना है।” अदालत ने मामले में आदेश सुरक्षित कर लिया है।
आगे क्या होगा?
विश्व मौसम संगठन ने चेताया है कि इल नीनो के कारण 2027 में चरम मौसम की संभावना बढ़ सकती है। वर्षा की कमी के दौर भविष्य में भी जारी रहेंगे। अब समय आ गया है कि दोनों राज्य मिलकर कृषि गतिविधियां समन्वित रूप से करें। केंद्र सरकार को कावेरी नदी के लिए एक नदी बेसिन संगठन स्थापित करने के काम को शुरू करना चाहिए क्योंकि वर्तमान संस्थाएं केवल विवाद समाधान के लिए बनी हैं। वर्तमान जल आवंटन व्यवस्था 2033 तक ही वैध रहेगी।

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