



*संस्कृत भारती एवं संस्कृत संस्कृति संस्थानम के संयुक्त तत्वाधान में मनाईं गई श्रीमद् भागवत गीता जयन्ती*
* संस्कृत भारती एवं संस्कृत संस्कृति संस्थानम के संयुक्त तत्वाधान में नेहरू महाविद्यालय में राष्ट्रीय धर्मशास्त्र श्रीमद् भागवत गीता जयन्ती समारोह धूमधाम से मनाया गया। शुभारम्भ प्रान्तीय उपाध्यक्ष, संस्कृत प्राचार्य डा.ओमप्रकाश शास्त्री ने दीप प्रज्जवलन एवं श्रीमद् भगवद्गीता ग्रन्थ का पूजन करके किया। प्रारम्भ में छात्र-छात्राओं ने श्रीमद् भगवद गीता का परायण किया। प्राचार्य ने कहा कि गीता ज्ञान को आत्मसात कर जीवन पथ पर आगे बढऩे वाले मनुष्य हर क्षेत्र में सफलता अर्जित करते हैं जबकि गीता रहस्य को न मानने वाले व्यक्ति पग-पग पर हार का सामना करतें हैं। लोगों को सत्य की रक्षा के लिए गीता का अध्ययन अवश्य करना चाहिये। कहा कि भगवत गीता का विश्व चिन्तन में बड़ा महत्व है। अर्थशास्त्र प्रो. डा.आशा साहू ने कहा कि इस देश की विभूतियों ने अपनी जीवन शैली गीता के अनुसार बनाई, जिससे वह आज भी भौतिक शरीर से न होने के बाद भी हमारे बीच अमर हैं। आचार्य शंकर, महर्षि अरविन्द, लोकमान्य तिलक, स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी, संत विनोबा भावे, सर्वपल्ली राधाकृष्णनन आदि ऐसे महापुरूष हैं। जिन्होंने अपने जीवन को गीतामय बनाया। हिन्दी प्राध्यापक डा.सुधाकर उपाध्याय ने कहा कि आज युवा पीढ़ी को विद्वान आचार्यों से गीता के ज्ञान को ग्रहण कर संस्कार एवं संस्कृति को सीखना चाहिये। जिससे वह अपने जीवन में सफलता प्राप्त करेंगे। मनोविज्ञान प्रवक्ता डा.संजीव शर्मा ने कहा कि आज आवश्यकता है कि सम्पूर्ण राष्ट्र में गीता ज्ञान का प्रसार किया जाये। जिससे सम्पूर्ण देश के निवासियों में राष्ट्र प्रेम, देशभक्ति एवं कर्तव्य परायणता की भावना विकसित हो सके। संस्कृत प्राध्यापक डा.दीपक पाठक ने कहा कि भौतिकता के घनघोर अंधकार में भटकती मानव जाति के उद्धार के लिए गीता का आलोक ही एक मात्र उपाय है। इसका गंभीर अध्ययन तथा उसके संदेश का परिचालन व्यक्ति एवं समाज तथा मानवता की रक्षा करने में समर्थ है। डा.प्रीति सीरोठिया ने कहा कि भारतीय दर्शन में धर्म को एक जीवन पद्धति माना गया है। धर्म प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है। युद्ध शस्त्रों से नहीं होता है, वैचारिक भी होता है। हमारे अंतर्मन में द्वंद होता है। उस द्वंद में गीता ही हमारा मार्गदर्शन कर सकती है। कृषि संकाय अध्यक्ष डा. हरीशचंद्र दीक्षित ने कहा कि गीता जीवन को सुधारने का ग्रंथ है। भारतीय दर्शन सर्वधर्म सम्भाव पर आधारित है। श्रीमद् भगवत गीता के दर्शन को अपने ही देश में नहीं बल्कि पश्चिमी देशों में भी सराहा गया। गीता की विदुषी डा.जनक किशोरी शर्मा ने कहा कि भगवदगीता की मूल प्रेरणा समर्पण व आश्वासन हैं। मनुष्य का भगवान के प्रति सच्चा सर्मपण हो तो फिर उसे किसी तरह की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। गीता जीवन और संसार की चुनौतियों से भागने की नहीं, बल्कि उनसे मुकाबला करने की सीख देता है। डा.रामकुमार रिछारिया ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को किसी फल की आशा से अपना कर्म करते रहना चाहिये। इस दौरान हिमांशधर द्विवेदी, जितेन्द्र कुमार, डा.हरीशचंद्र दीक्षित, डा.सुभाष जैन, डा.सजीव शर्मा, डा.सुधाकर उपाध्याय, डा.शैलेन्द्र सिंह चौहान, डा.विनीत अग्निहोत्री, संदीप श्रीवास्तव, डा.अनूप दीक्षित, डा.जगवीर सिंह, डा.जितेन्द्र राजपूत, डा.रोहित वर्मा, डा.रजनी चौबे, फहीम बख्श, ध्रुव किलेदार आदि उपस्थित रहे। संचालन डा.प्रीति सीरोठिया ने व डा. दीपक पाठक ने आभार जताया।

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