




ईश्वर को कोई भगवान कहता है, कोई अल्लाह, कोई वाहेगुरु, तो कोई बुद्धत्व या सत्य का नाम देता है। नाम भिन्न हो सकते हैं, किंतु ईश्वर का अस्तित्व है, तो उसका स्वरूप एक ही होनी चाहिए सार्वभौमिक, समन्वयकारी और जीवनदायी। समस्या नामों या उपासना-पद्धतियों की नहीं, बल्कि उस असहिष्णुता की है, जो विभिन्न व्याख्याओं के कारण समाज में टकराव और विभाजन को जन्म देती है। यदि सृष्टि के संचालन में परस्पर विरोधी इच्छाएँ होतीं, तो प्रकृति में संतुलन के स्थान पर अराजकता दिखाई देती। इसलिए ईश्वर का वास्तविक अर्थ सत्य, चेतना और करुणा से जुड़ा हुआ है, न कि विभाजन से।आज विश्व जिन संघर्षों, युद्धों और घृणा की घटनाओं से गुजर रहा है, उनका मूल कारण ईश्वर की विविध व्याख्याएँ नहीं, बल्कि मानवता की उपेक्षा है। मेरे लिए ईश्वर एक ऐसी सार्वभौमिक चेतन शक्ति है, जो पूरे ब्रह्मांड को संचालित करती है और प्रत्येक जीव में समान रूप से विद्यमान है। एकत्व की भावना समाज को तोड़ती नहीं, बल्कि जोड़ने का कार्य करती है। यह बोध कराती है कि हम सभी उसी एक चेतना के अंश हैं; इसलिए मनुष्य–मनुष्य के बीच ऊँच-नीच, भेदभाव और घृणा का कोई नैतिक औचित्य नहीं हो सकता।
भारतीय दर्शन और चिंतन-परंपरा इस एकत्व की सशक्त साक्षी रही है। महावीर ने अहिंसा को सर्वोच्च धर्म बताया, बुद्ध ने करुणा को मुक्ति का मार्ग माना और महात्मा गांधी ने सत्य को ही ईश्वर का स्वरूप कहा। जैन और बौद्ध दर्शन से लेकर आधुनिक राष्ट्रीय आंदोलन तक, सभी का मूल संदेश यही रहा है कि प्रत्येक जीव में चेतना है और इसलिए हर जीवन सम्मान के योग्य है। इन विचार परंपराओं का निष्कर्ष स्पष्ट है—मानवता सर्वोपरि है, और उसी भावना से राष्ट्र भी सशक्त, सुरक्षित और समरस बनता है।
यदि हम सबका जन्म एक ही प्राकृतिक प्रक्रिया से होता है और अंततः सभी को इसी मिट्टी में विलीन होना है, तो जाति, वर्ग, धर्म या संपत्ति के आधार पर श्रेष्ठता का दावा किस तर्क पर किया जा सकता है? राजा और रंक, अमीर और गरीब अंततः सबकी नियति समान है। जीवन की क्षणभंगुरता हमें यह सिखाती है कि अहंकार नहीं, बल्कि संवेदना ही मनुष्य का वास्तविक आभूषण है।
हाल की घटनाएँ जैसे अहमदाबाद की विमान दुर्घटना इस सत्य को और गहराई से उजागर करती हैं। लोग अपने परिवारों, सपनों और भविष्य की योजनाओं के साथ यात्रा पर निकले थे, लेकिन एक क्षण में सब कुछ समाप्त हो गया। ऐसी घटनाएँ हमें यह स्मरण कराती हैं कि जीवन स्थायी नहीं है। इसलिए संग्रह, प्रतिस्पर्धा और प्रदर्शन से अधिक आवश्यक है सेवा, सहयोग और करुणा।
नववर्ष केवल कैलेंडर बदलने का अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन और संकल्प का समय है। इस नए वर्ष में हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम धार्मिक, सामाजिक और वैचारिक विभाजनों से ऊपर उठकर मानवता को प्राथमिकता देंगे। हम शक्ति का उपयोग शोषण के लिए नहीं, बल्कि संरक्षण के लिए करेंगे और धर्म को केवल पूजा-पद्धति तक सीमित न रखकर उसे अपने आचरण और सामाजिक व्यवहार में उतारेंगे।
एक नागरिक और एक संवेदनशील मनुष्य के रूप में मेरा दृढ़ विश्वास है कि विचार केवल शब्दों तक सीमित नहीं रहने चाहिए। समाज के सबसे उपेक्षित और वंचित वर्गों तक शिक्षा, चेतना और आशा की रोशनी पहुँचाना ही सच्ची साधना है। मलिन बस्तियों में शिक्षा, अधिकारों और मानवीय गरिमा के लिए किया गया हर प्रयास इसी विचारधारा का व्यावहारिक रूप है।
धर्म यदि मनुष्य को मनुष्य से जोड़ न सके, तो वह आस्था नहीं, केवल पहचान बनकर रह जाता है। जब तक जीवन है, किसी के चेहरे पर मुस्कान लाने का प्रयास ही सबसे बड़ा धर्म है। एक ईश्वर, एक मानवता और एक ही धरती यदि हम इस सत्य को आत्मसात कर लें, तो हमारा समाज अधिक न्यायपूर्ण, शांत और मानवीय बन सकता है।

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