देश भर में पिछले लगभग एक महीने से लोग एक ऐसे सवाल को लेकर राज्य की शक्ति और गुस्से का सामना कर रहे हैं, जिस सवाल को किसी लोकतांत्रिक देश के नागरिक को नहीं पूछना चाहिए। उनका रोष स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न (SIR) अभ्यास से जुड़ा है, जिसने जून 2025 से अब तक 13 करोड़ से ज्यादा नाम मतदाता सूची से हटा दिए हैं। इनमें से एक चौथाई से अधिक को मृत या डुप्लिकेट बताया गया, जबकि अधिकांश को अनुपस्थित या स्थानांतरित करार दिया गया है। दिल्ली के बेला एस्टेट में एक बूथ पर 729 में से 728 नाम काटे गए, असली पते के दस्तावेजों की त्रुटि के कारण। आखिर यह फैसला किसने लिया कि इतने नाम हटाने हैं और वह आधार क्या था?




नाम हटाने की प्रक्रिया और SIR
राजनीतिक बहस संसद और सड़कों पर जारी है, लेकिन यह साफ है कि SIR ने मतदाता सूची में नाम होने के तरीके को बदल दिया है। 1995 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि एक बार सूची में शामिल नाम को कानूनी तौर पर वैध मानना चाहिए। लेकिन SIR ने इस पूर्व धारणापर आधारित प्रक्रिया की जगह डेटा मिलान के आधार पर नामों को हटाने का रास्ता अपनाया है।
चुनाव आयोग का सॉफ़्टवेयर आधारित फैसला
इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया (ECI) ने इस सार्वजनिक कार्य के लिए भारी मात्रा में सॉफ़्टवेयर का सहारा लिया है, जहां एक भी त्रुटि की कीमत एक नागरिक के वोट की हानि हो सकती है। इस बदलाव ने मतदाता सूची में नाम रखने के पुराने नियम को समाप्त कर दिया।

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